आदर्श कृष्णिका पृष्ठ के विभिन्न ताप पर स्पैक्ट्रमी ऊर्जा वितरण वक्र
आदर्श कृष्णिका पृष्ठ के विभिन्न ताप पर स्पैक्ट्रमी ऊर्जा वितरण वक्र :- कृष्णिका एक आदर्श पिंड है जो सभी आपतित विकिरणों को अवशोषित करती है और किसी भी तापमान पर अधिकतम संभव विकिरण उत्सर्जित करती है। कृष्णिका से उत्सर्जित विकिरण केवल इसके तापमान पर निर्भर करती है, पदार्थ पर नहीं। एक निश्चित तापमान पर स्पेक्ट्रमी उत्सर्जन क्षमता (इकाई क्षेत्रफल से इकाई समय में, प्रति इकाई तरंगदैर्घ्य या आवृत्ति अंतराल में विकिरित ऊर्जा) व तरंगदैर्घ्य (अथवा आवृत्ति) के मध्य आरेख को स्पैक्ट्रमी ऊर्जा वितरण वक्र कहते हैं।
स्पैक्ट्रमी ऊर्जा वितरण वक्र का
प्रायोगिक अवलोकन [लूमर एवं प्रिंग्सहाइम (Lummer & Pringsheim), 1899–1900]
हेनरिक लुमर (Heinrich Lummer) और अर्न्स्ट प्रिंगशाइम (Ernst Pringsheim) ने एक (लगभग) आदर्श कृष्णिका (छोटे छिद्र वाली खोखली गुहा) पर सावधानीपूर्वक प्रयोग किए। उन्होंने विकिरण के तीव्रता वितरण को मापा और पाया कि :
(1). किसी दिए गए तापमान पर तीव्रता, λ = 0 पर शून्य से बढ़ती है, एक निश्चित तरंगदैर्ध्य λmax पर अधिकतम मान तक पहुँचती है और फिर तरंगदैर्ध्य λ बढ़ने पर घटती है।
(2). जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है,
- वक्र का शिखर (λmax) कम तरंगदैर्ध्य (नीले वर्ण की ओर) की ओर स्थानांतरित हो जाता है।
- वक्र द्वारा परिबद्ध कुल क्षेत्रफल (अर्थात कुल उत्सर्जित ऊर्जा) तेजी से बढ़ता है।
(3). इन अवलोकनों से वीन का विस्थापन नियम प्राप्त हुआ :
(4). प्रायोगिक वक्र आकृति में किसी घंटी की भांति दिखाई देते थे।
(5). किसी निश्चित ताप पर स्पैक्ट्रमी ऊर्जा वक्र के द्वारा घेरा गया क्षेत्रफल वस्तु की स्पैक्ट्रमी उत्सर्जन क्षमता को प्रदर्शित करता है।
(6). अधिकतम उत्सर्जन की तरंगदैर्घ्य पर स्पेक्ट्रमी उत्सर्जक क्षमता, तापमान की पांचवीं घात के रूप में बढ़ती है।
[इसे प्लैंक के नियम से प्राप्त किया जा सकता है :
शिखर तरंगदैर्ध्य λm पर :
क्यूंकि ,
]

