चालक स्थिरवैद्युतिकी
चालक स्थिरवैद्युतिकी :- जब किसी चालक को विद्युत क्षेत्र में रखा जाता है, तो वह अपने भीतर आवेश की मुक्त गति के कारण भिन्न-भिन्न प्रकार के व्यवहार प्रदर्शित करता है। विद्युत क्षेत्र में चालकों के मुख्य गुण नीचे दिए गए हैं :
1. मुक्त आवेश (इलेक्ट्रॉन) की सरलता से गति
चालकों में मुक्त इलेक्ट्रॉन होते हैं जो किसी विशेष परमाणु से बंधे नहीं होते हैं। जब बाह्य विद्युत क्षेत्र आरोपित किया जाता है, तो ये इलेक्ट्रॉन एक बल का अनुभव करते हैं और विद्युत क्षेत्र की विपरीत दिशा में चलना प्रारम्भ कर देते हैं। आवेश यह गति तब तक करता है जब तक स्थिरवैद्युत साम्यावस्था (electrostatic equilibrium) में नहीं आ जाता।
2. विद्युत क्षेत्र चालक की सतह के लंबवत होता है
चित्र में चालक की सतह के निकट स्थित एक मुक्त धनावेश पर बाह्य विद्युत क्षेत्र के प्रभाव को दर्शाया गया है। (इसी प्रकार, मुक्त इलेक्ट्रॉन इसके विपरीत दिशा में गति करेंगे।) यदि विद्युत क्षेत्र का कोई घटक चालक की सतह के समान्तर हो, तो वह मुक्त आवेशों पर बल लगाकर उन्हें सतह के साथ-साथ गति करने के लिए प्रेरित करेगा। आवेशों का यह पुनर्वितरण तब तक चलता रहता है, जब तक कि वैद्युतस्थैतिक साम्यावस्था (Electrostatic Equilibrium) स्थापित नहीं हो जाती।
वैद्युतस्थैतिक साम्यावस्था में चालक के प्रष्ठ के समान्तर विद्युत क्षेत्र का कोई घटक नहीं हो सकता। यदि ऐसा कोई घटक उपस्थित हो, तो वह मुक्त आवेशों पर निरन्तर बल लगाकर उन्हें गतिशील बनाए रखेगा। अतः साम्यावस्था में विद्युत क्षेत्र का स्पर्शरेखीय (समान्तर) घटक शून्य हो जाता है और परिणामी विद्युत क्षेत्र चालक की सतह के लम्बवत (अभिलम्बवत) होता है।
3. चालक के भीतर विद्युत क्षेत्र शून्य होता है
स्थिरवैद्युत साम्यावस्था पर, चालक के भीतर आवेश स्वयं को इस प्रकार पुनर्वितरित करते हैं कि चालक के भीतर परिणामी विद्युत क्षेत्र शून्य हो जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पुनर्वितरित आवेशों द्वारा उत्पन्न आंतरिक विद्युत क्षेत्र, आरोपित बाह्य विद्युत क्षेत्र को पूर्ण रूप से निरस्त कर देता है।
जब किसी चालक को विद्युत क्षेत्र में रखा जाता है, तो वह ध्रुवीकृत हो जाता है। ऊपर दिया गया चित्र मूल रूप से एकसमान विद्युत क्षेत्र में एक उदासीन चालक को रखने के परिणाम को दर्शाता है। चालक के निकट क्षेत्र प्रबल हो जाता है लेकिन उसके भीतर पूर्ण रूप से शुन्य हो जाता है।
4. चालक अपने आन्तरिक भाग को बाह्य विद्युत क्षेत्र से विलगित रखते हैं – स्थिरवैद्युत परिरक्षण (Electrostatic Shielding)
किसी निश्चित भाग को वैधुत क्षेत्र के प्रभाव से बचाने की प्रक्रिया को विधुतीय परिरक्षण अथवा स्थिरवैद्युत परिरक्षण कहते है। चालक स्थिरवैद्युत ढाल (electrostatic shields) के रूप में कार्य कर सकते हैं। चूंकि चालक के भीतर विद्युत क्षेत्र शून्य होता है, इसलिए संवेदनशील उपकरणों को एक चालक पिंजरे (जैसे फैराडे पिंजरे) के भीतर रखने से इन्हें बाह्य विद्युत क्षेत्रों से बचाया जा सकता है। यही कारण है आसमानी बिजली गिरने के समय गाड़ी में बैठे रहना, किसी पेड़ के नीचे या खुले मैदान में रहने की तुलना में अधिक सुरक्षित रहता है।
5. चालक समविभव प्रष्ठ की तरह व्यवहार करते हैं
चूँकि चालक के भीतर विद्युत क्षेत्र शून्य () होता है और चालक के प्रष्ठ के समान्तर विद्युत क्षेत्र का कोई घटक नहीं होता (
), अतः चालक के भीतर और प्रष्ठ के अनुदिश किसी आवेश को गति कराने में कोई कार्य नहीं करना पड़ता।
अर्थात्
विद्युत विभव (V) = नियत
अतः चालक के भीतर व प्रष्ठ पर विभव का समान होता है और यह चालक के आकर, आकृति व आवेश विन्यास पर निर्भर नहीं करता।
6. चालक को दिया गया आवेश उसकी सतह पर रहता है
चालक पर उपस्थित सम्पूर्ण अतिरिक्त आवेश उसकी सतह पर रहता है। आवेश स्वयं को इस प्रकार पुनर्वितरित करते हैं कि समान प्रकृति के आवेशों के मध्य प्रतिकर्षण बल न्यूनतम हो, जिससे अंततः स्थिरवैद्युत साम्यावस्था की स्थिति बनती है। चालक के भीतर गाउस के नियम से,
किन्तु हम जानते हैं कि चालक के भीतर विद्युत क्षेत्र शुन्य होता है (), अतः
अर्थात् वैद्युतस्थैतिक साम्यावस्था में चालक के भीतर कोई अतिरिक्त आवेश नहीं हो सकता तथा यदि कोई अतिरिक्त आवेश उपस्थित हो, तो वह चालक के प्रष्ठ पर ही स्थित होगा।
सतह की विशेषताओं के आधार पर, चालकों को दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है :
(a) एकसमान आकार के चालक – इनमें एकसमान, सममित सतह होती है जहाँ पृष्ठीय आवेश घनत्व एकसमान होता है। उदाहरण के लिए : गोला, बेलन, सपाट चद्दर, आदि।
(b) असमान आकार के चालक – इनकी सतह अनियमित होती है, इनमें प्रायः तीखे शीर्ष या किनारे होते हैं, जहाँ आवेश अधिक सघनता से जमा होता है, जिसके परिणामस्वरूप असमान पृष्ठीय आवेश वितरण होता है। उदाहरण के लिए : नुकीला सिरा, किनारा, खुरदरी या अनियमित सतहें।
उपरोक्त चित्र में :
- तीक्ष्ण बिंदुओं (कम वक्रता त्रिज्या) पर, विद्युत प्रतिकर्षण बल का लंबवत घटक (
) समानांतर घटक (
) से अधिक होता है। परिणामस्वरूप, आवेशित कण एक दूसरे के निकट रहते हैं, जिससे सतह पर आवेश घनत्व अधिक हो जाता है।
- समतल क्षेत्रों (कम वक्रता त्रिज्या) पर, बल का समानांतर घटक प्रभावी होता है (
), जिसके कारण आवेश एक दूसरे से दूर जाने का प्रयास करते है और परिणामस्वरूप पृष्ठीय आवेश घनत्व कम हो जाता है।
तीक्ष्ण बिंदुओं पर अधिक पृष्ठीय आवेश घनत्व की उपरोक्त अवधारणा को वक्रता त्रिज्या के आधार पर भी समझा जा सकता है। चूँकि चालक समविभव पृष्ठ की भांति व्यवहार करते हैं, इसलिए चालक के प्रत्येक बिंदु पर विभव समान होता है। V = स्थिरांक। अब यदि rc चालक के किसी भाग की वक्रता त्रिज्या है, तो विद्युत विभव इस प्रकार दिया जाता है :
यदि σ पृष्ठीय आवेश घनत्व है, तो आवेश q को के रूप में लिखा जा सकता है। पुनः विभव V :
अतः जहाँ वक्रता त्रिज्या (rc) कम होती है वहां पृष्ठीय आवेश घनत्व (σ) अधिक होता है जैसे की चालक के नुकीले सिरे और किनारों पर।




